Saturday, October 17, 2020

रहस्मय बैग {प्रथम चरण}


यह कहानी एक छोटे से परिवार की है  जिसमें ज्योति, सुनील और उनका बेटा रजत रहते थे                                                                                                                                                                                                                                                                 एक दिन की बात है, ज्योति मार्केट जा रही थी, मौसम खराब था,  तभी अचानक बहुत तेज बिजली कड़की,  बिजली की रोशनी इतनी तेज थी कि,  किसी को कुछ नहीं दिखाई दे रहा था कुछ देर तक आंखों के सामने सिर्फ रोशनी ही रोशनी थी, कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, ज्योति ने  आंखें  खोली तो सब कुछ ठीक हो चुका था, ज्योति के सामने एक 15  साल का लड़का खड़ा था, ज्योति बोली........... बेटा डरो मत,  सब कुछ ठीक हो चुका है, आप अपने घर जाओ, ज्योति वहां से जाने लगी, लड़का ज्योति के पीछे पीछे चलने लगा,  ज्योति ने कहा........... तुम,  मेरे पीछे क्यों आ रहे हो? बेटा,  अपने घर जाओ, लड़के ने  कोई जवाब नहीं दिया,  ज्योति को लगा शायद वह घर का रास्ता भूल गया हैं,   लेकिन लड़के ने कोई जवाब नहीं दिया, ज्योति को लगा शायद यह बोल नहीं सकता, मैं इसे मार्केट में अकेला नहीं छोड़ सकती, ज्योति उस लड़के को लेकर अपने घर गई।  घर जाते ही सुनील ने पूछा...........  ये कौन है? तुम किसको ली आई,  ज्योति, सुनील को  पूरी बात बताती है, सुनील बोलता है........... चलो चलते हैं दोनों पुलिस स्टेशन, दोनों   उस लड़के को लेकर  पुलिस के पास गए और पूरी बात बताई, पुलिस ने लड़के से पूछा........... तुम कौन हो बेटा और कहां से आए हो?  तुम्हारे मम्मी पापा कहां पर हैं,  लड़के ने तुरंत जवाब दिया,  यही मेरे मम्मी पापा हैयह सुनकर सुनील और ज्योति हैरान थे कि यह लड़का झूठ क्यों बोल रहा है और यह बोल कैसे रहा है, हम तो कब से उससे बोलने की कोशिश कर रहे थे एक शब्द भी नहीं कहा,  पुलिसवाला गुस्से में........... तुम मेरा वक्त खराब करने आए हो, तुम अपने बेटे को ही लेकर आए हो, मेरे पास,  सुनील..........नहीं साहब  यह झूठ बोल रहा है,  पुलिसवाला गुस्से में........... तुम अभी यहां से चले जाओ,  ज्योति और सुनील लड़के को लेकर घर चले जाते है, घर जाकर,  सुनील ने लड़के से पूछा...........  तुमने ऐसा क्यों कहा?  लड़के ने कहा........... मैं आपका ही बेटा हूं ,ज्योति बोली...........तुम झूठ क्यों बोल रहे हो,  तुम हमारे बेटे नहीं हो, हमारा बेटा अभी 5  साल का है, लड़के ने कहा........... मैं आपका  ही बेटा हूं,  पापा, मैं आपसे यह कहने आया हूं कि, आप कोई सा भी बैग किसी से मत लेना,

मै  आपसे विनती करता हु, मत लेना, सुनील ने कहा...........तुम हो कौन? लड़के ने कहा, मैं आपका बेटा,   इतना कह कर वो  वहां से चला जाता है ।                                                                                                                                                                                                                       कुछ दिन बाद  सुनील अपने ऑफिस जाता है। थोड़ी देर बाद सुनील का बॉस उसे अपने पास में  बुलाता है और एक बैग देते हुए कहता है,  ये बेग तुम्हे जिम्मेदारी के सात दुबई ले जाना है,  ये सुनकर सुनील को उस बच्चे की याद आई की उस लड़के ने बैग के बारे में ही कहा था,  सुनील ने बॉस से पूछा इसमें है क्या?  बॉस ने कहा इसमें बोहत जरुरी चीज है, तुम्हे इसे पोहचना  है,  मै  इसके तुम्हे बोहत अच्छे पैसे दुगा,  पैसे का नाम सुनते ही सुनील ने  सोचा,  पैसे की तो बोहत जरूरत हे अभी,  में ये काम कर लेता हु।                                                                                                                                                                                                                                                                                                              अगली सुबह सुनील  बैग लेके दुबई जाने को  निकल जाता है,  रस्ते में वो सोचता है की,  बैग में ऐसा है क्या?  कही इसमें कुछ गलत तो नहीं,  क्यों न में इसे खोलके चेक करलेता हु,  मुझे संतुस्टि हो जाएगी सुनील बैग को खोलता है,  बैग में एक बॉक्स था जिसपर एक नंबर लिखा था 2019  सुनील बॉक्स खोलने की कोशिस करता है लेकिन बॉक्स नहीं खुलता,  वह उसके नंबर को  जैसे ही चेंज  करता है,  बॉक्स में से बोहत तेज रौशनी निकलती है,  सुनील को कुछ दिखाई नहीं देता थोड़ी देर बाद सुनील आंखें खोलता है और सोचता है मौसम कितना खराब है इतनी तेज बिजली कड़की है,  कुछ दिखाई भी नहीं दिया,  सुनील को समझ में नहीं आया कि यह रोशनी उस बॉक्स में से निकली थी,  सुनील टाइम देखता है उसके फ्लाइट का टाइम हो चुका था उसके फ्लाइट छूट चुकी थी,  सुनील सोचता है कि अब तो फ्लाइट छूट चुकी हैं, क्यों ना घर चला जाऊं, कल दुबई चला जाउगा सुनील जैसे ही घर जाता है,  वह अपना घर देखकर चौक जाता है 

Sunday, April 26, 2020

दस रुपए का नोट........... एक प्रेम कहानी ( तीसरा भाग)


                                                               6 महीने बाद ,                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          "रवि"  जिसने दिव्या की जान बचाई थी,  वह दिव्या को उसके घर छोड़ने आया था ।                                                                                                                                                                                 दिव्या ने अविनाश का दरवाजा खटखटाया,   एक खूबसूरत औरत ने दरवाजा खोला,  उसका नाम "सुरभी" था, सुरभी ने पूछा...........  आप  कौन?  आपको  किससे  मिलना हे?  उसने कहा मुझे,  अविनाश से मिलना है, सुरभी  अविनाश को बुलाती हे, अविनाश,  अविनाश ने पूछा   ...........  कौन है, किससे मिलना है?  सुरभी ने कहा...........  आप से, अविनाश बाहर आया और देखते ही उसे पसीना आने लगा,  अविनाश हेरान था, ऐसा कैसे हो सकता है? बहार दिव्या खड़ी थी ,दिव्या को,  देख अविनाश डर गया, दिव्या ने भाग कर अविनाश को गले लगा लिया, सुरभी को कुछ समझ नहीं आ रहा था,  सुरभी ने अविनाश से पूछा...........  ये कौन  है, ये रो क्यों रही है?    अविनाश ने कहा...........   मैं,  इसे नहीं जानता ,यह कौन है और क्यों रो रही है?  यह बात सुनकर दिव्या चौक गई और दिव्या ने कहा...........  तुम, मुझे नहीं जानते,  तुम ऐसा कैसे बोल सकते हो,  तुम मुझे कैसे भूल सकते हो?  हम तो एक दूसरे से बहुत ज्यादा प्यार करते है ।  अविनाश ने कहा...........  मैं,  तुमसे नहीं,  मैं,  अपनी पत्नी सुरभी  से प्यार करता हूं, तुम यहां से अभी चली जाओ। तुम्हारे मरने की खबर के बाद,  मैं,  तुम्हें भुला चुका था। तुम अचानक आ गई हो,  तो इसमें मेरी क्या गलती?                                                                                                                                                                                                                                                  दिव्या रोते हुए बाहर चली गई,  रवि ने पूछा........... क्या हुआ? दिव्या ने कुछ नहीं कहा,  रवि दिव्या को लेकर अपने दोस्त के घर चला गया। रवि ने,  दिव्य से पूछा........... मैं,  तुम्हें , तुम्हारी मम्मी पापा के घर छोड़ देता हूं । रवि का  दोस्त,  संतोष ने रवि से पूछा कि,  भाई बात क्या है?  रवि ने पूरी बात बताई,  संतोष...........वह ऐसा कैसे कर सकता है, उसने तुम्हें ढूंढने की कोशिश भी नहीं की और 6 महीने के अंदर शादी भी करली । संतोष ने पूछा ...........तुम्हारे पति का नाम क्या है?  दिव्या,  अविनाश कुमार, वह रहता कहां है?  दिव्या ने बताया,  संतोष कुछ सोचने लगा तो रवि ने  पूछा क्या सोच रहा  हैं, संतोष एक फोटो लेकर आया और दिव्या को कहा,  क्या इसमें अविनाश है,  दिव्या ने कहा,हा,  लेकिन, तुम कैसे जानते हो उसे। हम एक ही हॉस्टल में एक ही कमरे में रहते थे। इसलिए मैं जानता हूं, दिव्या ने कहा........... तो इससे क्या होगा? वह तुम्हारी बात नहीं मानेगा । संतोष..........  तुम उससे कब मिली?  तुम तो इस शहर की भी नहीं हो,  क्या अविनाश कभी तुम्हारे शहर गया।  दिव्या ने कहा........... नहीं,  अविनाश कभी मेरे शहर नहीं आया। दिव्या ने अविनाश से मिलने की पूरी घटना संतोष को बताइ और यह सब सुनकर संतोष चौक गया।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                 संतोष ने दिव्या से कहा कि...........  कल,  तुम,  मेरे साथ उसके घर चलना। रवि बाहर से आता है और पूछता है...........  किसके घर जाना है?  संतोष ने कहा...........  कल हम सब अविनाश के घर जाएंगे। दिव्या ने कहा...........  मैं नहीं जाना चाहती। संतोष ने कहा...........  अगर तुम नहीं जाओगी तो तुम्हें सच कभी नहीं पता चलेगा। रवि ने कहा ........... कैसा सच?  संतोष ने कहा...........वहां पर चलोगे तभी पता चलेगा।                                                                                                                                                                                     अगले दिन,   रवि,  दिव्या और संतोष, अविनाश के घर गए, संतोष ने अविनाश का दरवाजा खटखटाया और अविनाश ने दरवाजा खोला,  संतोष और दिव्या को देखकर अविनाश डर गया था,  संतोष ने अविनाश को कहा ...........और यार बड़े दिनों बाद मिला,  कैसा है तू?  अविनाश ने कहा........... मैं ठीक हूं,  तू यहां पर क्या कर रहा है और  तू  दिव्या को कैसे जनता है,  इसे यहाँ क्यों लाया?  संतोष ने कहा.......... मेरे दोस्त ने इसकी जान बचाए थी और इसे तेरे पास लेके आया और तूने इसे अपनाने से इंकार कर दिया,  तू ऐसा कैसे कर सकता है और इतने सालो का प्यार सिर्फ 6 महीने में कैसे ख़तम हो गया?   संतोष ने पूछा, अविनाश से...........  इतना घबराया हुआ क्यों है?  ऐसा लग रहा है, जैसे तेरी कोई चोरी पकड़ी गई हो। अविनाश ने कहा........... मैंने कोई गलत काम नहीं किया,  तो मैं, क्यों घबराऊ । संतोष ने कहा ...........वह तो अभी पता चल जाएगा। संतोष ने पूछा पहले, ये बता की तुझे दिव्या का खत पहली बार कहा मिला था। अविनाश ने कहा.......... एक रेस्टुरेंट में,  ये बात सुन कर दिव्या के होश उडगए, दिव्या ने कहा.......... क्या रेस्टुरेंट में, तुम झूट बोल रहे हो, संतोष ने कहा.......... दिव्या तू अभी भी नहीं समझी, ये तुम्हारा अविनाश नहीं है, जिसे तुम प्यार करती हो।                                                                                                                                                                                                                                                           दिव्या रोते हुए.......... ऐसा नहीं हो सकता। संतोष ने कहा.......... ऐसा ही हुआ है, यह तुम्हारा अविनाश नहीं है, संतोष ने अविनाश से कहा.......... सच तू बताएगा या मैं बताऊं, अविनाश ने दिव्या से माफी मांगते हुए कहा.......... दिव्या, मैं तुम्हारा अविनाश नहीं हूं, मैं संतोष के साथ एक ही कमरे में रहता था, संतोष का कोई दोस्त रोज उसे चिट्ठी देता और संतोष उसे एक दुकान पर रखकर आता और दूसरी  चिट्ठी वहां से लेकर आता।                                                                                                                                                                                     एक दिन,  मैंने सोचा क्यों ना मैं  जाकर देखूं कि, वहां चिट्ठी लेने कौन आता है? मैं वहां पर गया और जब मैंने तुम्हें देखा तो  मैं तुम्हें देखता ही रह गया। मैं तुम्हें बहुत पसंद करने लगा, मैं तुम्हें रोज देखने आता, मैंने सोच लिया था कि, मैं तुम्हें अपना बना कर रहूंगा, इसलिए जब अगली बार संतोष के दोस्त की चिट्ठी आई तो, मैंने उसे छुपा दिया और खुद एक चिट्ठी लिखी और तुमसे मिलने को कहा। दिव्या रोते हुए.......... अच्छा जब मैंने तुमसे पूछा था कि चिट्ठी की राइटिंग अलग क्यों है, तो तुमने कहा था कि मेरे हाथ में चोट लगी है, मैं कितनी बड़ी बेवकूफ थी कि मैं यह बात समझ नहीं पाई। अविनाश ने कहा.......... बिल्कुल सही कहा, उसके बाद क्या हुआ, वो सब तो तुमें पता है।  दिव्या ने संतोष से पूछा.......... इसका मतलब जो तुम्हारा दोस्त है वही मेरा अविनाश है, तुम्हारा वह दोस्त कौन है? मैंने उसके साथ धोखा किया है, संतोष, नहीं तुमने कोई धोखा नहीं किया है, धोखा तुम्हारे साथ हुआ है। दिव्या वहां से जाने लगी,  रवि दिव्या को देख कर रोने लगा, दिव्या ने पूछा तुम क्यों रो रहे हो? तुम, मुझे मेरे घर छोड़ दो,तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद तुमने और तुम्हारे परिवार ने मेरी जान बचाई, संतोष बहार आया और दिव्या से कहा.......... दिव्या तुमने  अभी तक नहीं पहचाना, तुम्हारा अविनाश कोई और नहीं,  रवि है, दिव्या जोर से रोने लगी, रवि ने कहा.......... मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, तुमने मुझे कभी धोखा नहीं दिया, धोखा तुम्हारे साथ हुआ है, रवि दिव्या को लेकर  अपने साथ अपने शहर चला गया ।