Thursday, March 10, 2022

रहस्मय बैग {अंतिम चरण}


 सुनील ने जैसे ही,  अपने घर को देखा,  वह चौक गया,  क्योंकि उसके घर की जगह पर ,वहां पर एक होटल था । सुनील समझ नहीं पा रहा था कि,  सुबह तो मेरा घर था,  अचानक यह  होटल कहां से आ गया?

 

सुनील होटल में जाता है और होटल के मालिक से पूछता है कि,  सर मेरा घर था यहां पर मेरा घर कहां गया? होटल वाला बोला______________ तुम्हारा घर, यहां पर ऐसा कोई घर नहीं था।

सुनील ने कहा____________सुबह यहां मेरा घर था मेरी बीवी और मेरा बेटा था , कहां गया मेरा घर?  होटल कब बन गया यहां पर?  होटल वाला बोला__________ तुम पागल  हो गये हो,  तुम्हारा सुबह यहाँ पर  घर कैसे हो सकता है?

 

यह होटल में 10 सालों से चला रहा हूं ये  सुनकर सुनील  हैरान हो जाता है कि, ऐसा कैसे हो सकता है?  सुबह तो मेरा घर था,  यहाँ पर अचानक होटल  कैसे बन सकता है? 

 

                                 सुनील को कुछ समझ में नहीं आ रहा था,  कि वह क्या करें ? उसने होटल वाले से बहुत बार पूछने की कोशिश की,  कि अचानक यहां पर होटल कैसे बन सकता है ? होटल वाले ने सुनील को होटल से धक्के मार कर बाहर निकाल दिया।

 

                               सुनील तुरंत पुलिस स्टेशन गया , पुलिस स्टेशन जाकर सुनील ने कहा की_______ वहा पर  मेरे घर के बदले एक होटल बना दिया गया है?  सुनील ने होटल  का नाम बताया तो,  सारे पुलिस वाले हंसने लगे,  पागल हो गया है ये  होटल कई सालो से यहाँ पर है।

सुनील को पुलिस स्टेशन से भगा दिया गया, सुनील को कुछ समझ में नहीं  आ रहा था । यह सब हो क्या रहा है?  थोड़ी दूर जाकर सुनील ने सोचा क्यों,  ना मैं ऑफिस जाऊं,  क्या पता मुझे वहां से कुछ पता चल पाए,  सुनील तुरंत अपने ऑफिस की ओर जाता है।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                            ऑफिस में पहुंचते ही, उसको ऑफिस पूरी तरह से बदला हुआ नजर आता है, जिन्हें वह जानता था, उनमें से कोई भी वहां पर काम नहीं करता था, वहां पर खड़े एक आदमी से सुनील ने अपने बॉस के बारे में पूछा _________भाई साहब, यह रंजीत अग्रवाल कहां मिलेंगे? आदमी थोड़ा चौक गया था, उसने कहा, तुम पागल हो गए हो, तुम किसको ढूंढ रहे हो। सुनील ने कहा इस ऑफिस के मालिक को, आदमी बोला कि, भाई,  रंजीत अग्रवाल को मरे हुए 5 साल हो चुके हैं, सुनील हैरान था कि 5 साल, अभी तो मैं कल ही मिला था, सर से और 1 दिन में 5 साल हो गई।

 

                                          सुनील को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था । सुनील ने पूछा_______अब ये ऑफिस कौन चलाता है?  उनका बेटा चलाता है,  बेटा,  कहीं आप अमित अग्रवाल की बात तो नहीं कर रहे हैं , बिल्कुल सही कहा  यह ऑफिस अमित अग्रवाल ही चलाते हैं। सुनील हैरान था की  अमित अग्रवाल अभी दस  सा, ल का है,वो ऑफिस चला रहा है ।  

 

                                   सुनील ने सोचा क्या पता अमित अग्रवाल मुझे पहचान ले, लेकिन अमित  अग्रवाल को देख कर सुनील चौक गया , ये कौन है ? अमित अग्रवाल ने सुनील को पहचाने से इंकार कर दिया , सुनील को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि,  अब मैं क्या करूं यह कैसे हो गया 1 दिन के अंदर अंदर मेरा घर होटल में बदल गया मेरा बॉस वो मर गया यह अमित अग्रवाल इतना बड़ा कैसे  हो गया?

 

                                     तभी उसकी नजर सामने पड़ती है ,सामने एक लड़का था, यह वही लड़का था, जो ज्योति को मिला था । सुनील ने सोचा शायद इसी ने सब  किया हो , कहां है, मेरी बीवी बच्चे, बोल, तूने  उन्हें कहां छुपाया है, लड़का बोला_________ नहीं, मैंने नहीं छुपाया है और मैं आपका बेटा हूं, ऐसा क्यों करूंगा?  फिर से वही बात कर रहे हो, तुम,  मेरे बेटे नहीं हो, मेरा बेटा सिर्फ 5 साल का है।

                                                                        दोनों के बीच बहस चल रही थी, तभी अचानक लड़के ने , सुनील से कहा कि_________ मैंने आपसे कहा था कि, आप किसी भी तरह  के  बैग को मत लेना लेकिन,  आपने लिया। 

सुनील ने कहा________ हां , लिया, मेरा ऑफिस का काम था, जो मुझे करना था । लड़के ने पूछा_______  क्या इस बैग को आपने खोला था । सुनील ने कहा_______हां , मैंने खोला,  लड़का समझ गया था कि, आखिर हुआ क्या है और वह  खुश भी था।

                                                   सुनील ,लड़के से तुम खुश क्यों हो? लड़का सुनील को गले लगाते हुए ,पापा मैं बहुत खुश हूं, मैंने आपको कहां-कहां नहीं ढूढा, सुनील ने लड़के को धक्का देते हैं कहता है,  तुम मेरे बेटे नहीं हो,  लड़का, सुनील को एक न्यूज़पेपर  देता हैं, वह कहता है, इसे पढ़ो, सुनील कहता है________ मैं,नहीं,पढ़ रहा,   पापा आप पढ़ो तो सही, सुनील ने जैसे ही पेपर को पड़ता है , वह चौक जाता है।

सुनील कहता है___________ ऐसा नहीं हो सकता, लड़का बोला___________ ऐसा ही है,पापा , लेकिन  ऐसा कैसे हो सकता है? लगता है, इस पर डेट गलत छप गई है, 2004 की बदली 2019 छप गया है। 

लड़का बोलता है______ नहीं, यह 2019 ही है, सुनील कहता है______ तुम पागल हो, मैं 2019 में कैसे आ सकता हूं?  लड़का कहता है________ यह सब उस बैग की वजह से हैं, उस बैग को अपने खोला था , अगर आपने बैग के नंबरों को टच किया होगा तो, आप ने जो नंबर वहां पर डायल किया है,आप उस साल में पहुंच जाओगे, क्या आपने देखा था, कौन सा नंबर था, सुनील ने कहा मैंने देखा था, 2019 लिखा था, इसका मतलब आप 2019 में आ गए हैं? अब आप यहाँ से नहीं जा सकते ।  

                                   अब वो बैग हमारे पास नहीं है , अभी आप मेरे साथ घर चलो , सुनील ने साथ जाने से मना कर दिया। लड़के ने कहा,  मेरे साथ चलो  आप वहा चल कर सोचना करना क्या है?  सुनील, लड़के के साथ  चला जाता है ,लड़के ने दरवाजा खटखटाया तो उसकी माँ ने दरवाजा   खोला  ,उस औरत को देखकर सुनील  था की ये कैसे हो सकता है ?

                                     दरवाजा खोलने वाली कोई और नहीं सुनील की पत्नी ज्योति थी, जो बूढ़ी हो चुकी थी  ज्योति और सुनील एक दूसरे को पकड़ के  रोने लगे, ज्योति ने पूछा आप इतने साल कहा चले गए थे और आप अभी तक जवान कैसे है ? 15  साल हो गए, आप को  गायब हुए ,सुनील घुसे में ये सब इस लड़के वजह से,  न ये  मिलता न ये सब होता ।

                                                                       ज्योति बोली_______आप कैसी बात कर रहे हो, आप  ने पहचाना नहीं, सुनील बोलै ,क्यों नहीं , यह वही  लड़का है , जो तुम्हे मार्कीट में मिला था, ज्योति बोली_____ आप सही कह रहे है, लेकिन ये हमारा बेटा अश्विन है, इसने तुम्हे बेवकूफ बनाया है, ज्योति बोली______नहीं ,ये हमारा बेटा है  15 साल तक नहीं  थे, हमारे साथ,  मेने अश्विन को बड़ा होते देखा।  

          जो लड़का हमें मिला था, वो अश्विन ही था , तुम ये कैसे कह सकती हो?  ज्योति बोली______   जब अश्विन 10 साल का हुवा, तब मुझे पता चला की वो लड़का और कोई नहीं हमारा अश्विन था, अश्विन ने आप को बोहत ढूढ़ने की कोशी की, की आप किस साल में चले गए है , लेकिन वो नहीं ढूढ पाया , तो उसने मुझे से पूछा की आप कब गायब हुए थे ,   तब वो उस साल में आया था, जब वो हमें मिला वो 10  साल का का था, वो आप को मना करने आया था,  बैग नहीं खोलना   ,   लेकिन आप ने बैग खोल दिया और बाकि सब आपको   पता है, सुनील ज्योति से पूछा, घर   कब छोड़ा,  कुछ सालो बाद मेने घर छोड़ दिया    अश्विन को अच्छी जिंदगी के लिए ,  बेटे को गले लगाया ।

 सुनील अपने पुरे 15 साल  खो   चूका था, जिसे वह चाह  कर भी नहीं जी सकता था और नाही वह किसी दूसरे बैग की  सहायता  से वहाँ जाना चाहता था ,अब वो अपने  परिवार के साथ था ।

Monday, March 7, 2022

रह्स्य्मय शादी (छाया की अनोखी और अधूरी प्रेम कहानी)


 घर में बहुत हलचल थी,  शोर शराबा था,  सुबह के लगभग 4:00 बज रहे हैं, शोर शराबें  की आवाज छाया को  सोने नहीं दे रही थी । 

छाया उठी और सोचने लगी,  इतनी जल्दी सुबह हो गई,  अभी तो मै सोई थी और सुबह-सुबह घर में  इतना शोर शराबा कौन कर रहा है ।  छाया कमरे से जैसे बाहर आई वह चौक गई ,  घर को पूरी तरह से दुल्हन की तरह सजाया हुआ था, छाया सोचने लगी,  आज क्या है? जो मुझे याद नहीं,  मम्मी पापा की शादी की साल गिरा वह तो नहीं है, तो फिर क्या है,  मेरा जन्मदिन भी आज नहीं है,  अर्पिता का भी नहीं  है, तो आज है क्या?                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                काफी देर सोचने के बाद,  छाया ने सोचा,  क्यों ना मम्मी से ही पूछा जाए,  छाया अपनी मम्मी के पास गई और अपनी मम्मी से पूछ____________ मम्मी आज है क्या?  जो घर को इतना सजाया गया है।                                                                                                                                                                                                                                                                 मालिनी बोली_______ बेटा,  तू अभी सो के उठी हैं, सभी रस्मों के लिए देर हो जाएगी है। छाया को कुछ समझ में नहीं आया,  रस्मे कैसी रस्मे मां?  मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा,  आप कहना क्या चाहती है?  बेटा तू फिर भूल, आज शादी है , छाया जोर-जोर से  हसने लगी, क्या मम्मी?  आप भी मजाक अच्छा कर लेती हो,  मेरी शादी और मुझे याद नहीं है, हा बेटा आज ही तुम्हारी शादी,  लेकिन मुझे क्यों याद नहीं है?                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  हमने  रात को ही तो बात की थी। तुमको जो चाहिए था,  सब हमें खरीद लिया, छाया का बोली_________ अच्छा मम्मी,  चलो मुझे दिखाओ,  मालिनी ने छाया को उसका लहंगा उसका चूड़ा और जितने भी शादी में इस्तेमाल होने वाली चीजें थी,  सभी उसको दिखाइ,  छाया हैरान थी  कि ये सब तो मेरी पसंद की चीजें हैं, जो  मैंने सोचा था कि,  जब मैं शादी करूंगी यही सब लूंगी इसी तरह का सारा सामान, लेकिन मुझे याद क्यों नहीं है?  कि आज मेरी शादी है।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                            मालिनी बोली__________ बेटा,  अभी मजाक का टाइम नहीं है, बहुत काम है,  तुम जाओ जल्दी से तैयार हो जाओ,  अच्छा मम्मी एक आखिरी बात बताओ कि,  मेरा दूल्हा कौन है? 


                                                          मालिनी  बोली_________ बेटा,  यह मजाक का टाइम नहीं है,  तुम्हें तुम्हारा दूल्हा भी याद नहीं। मम्मी , मुझे कुछ याद नहीं,  बेटा तुम हद करती हो, मालिनी वह से चली  जाती है ।


                                                      छाया को  कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि,  यह हो क्या रहा है ? छाया ने सोचा कहीं,  अर्पिता मेरे साथ कोई मजाक तो नहीं कर रही और मम्मी पापा सब लोग मिले हुए है, लेकिन इतना खर्चा करके  कोई मजाक क्यों करेगा । 


                                                     छाया, अर्पिता के कमरे में गई और अर्पिता को गुस्सा करने लगे कि, तू मेरे साथ मजाक कर रही है ना कि, आज मेरी शादी है।

                                                      अर्पिता बोली________ नहीं दीदी,  आज सच में आपकी शादी है,  छाया,  लेकिन मुझे कुछ याद  क्यों नहीं है? 

                                                                  अर्पिता बोली ______क्या बात कर रहे हो ? दीदी आपको कुछ याद नहीं ।

छाया बोली_________मुझे कुछ भी याद नहीं है,  मुझे तो यह भी नहीं याद है कि,  मेरा दूल्हा कौन है?

अर्पिता दीदी आप मजाक कर रहे हो ना,  छाया, अर्पिता से हाथ जोड़ कर कहती है________ प्लीज मुझे इतना बता दे कि,  मेरा दूल्हा कौन है ?      

                       "बाकी की कहानी अगले भाग में , आखिर कर छाया को कुछ याद क्यों नहीं है"

Saturday, October 17, 2020

रहस्मय बैग {प्रथम चरण}


यह कहानी एक छोटे से परिवार की है  जिसमें ज्योति, सुनील और उनका बेटा रजत रहते थे                                                                                                                                                                                                                                                                 एक दिन की बात है, ज्योति मार्केट जा रही थी, मौसम खराब था,  तभी अचानक बहुत तेज बिजली कड़की,  बिजली की रोशनी इतनी तेज थी कि,  किसी को कुछ नहीं दिखाई दे रहा था कुछ देर तक आंखों के सामने सिर्फ रोशनी ही रोशनी थी, कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, ज्योति ने  आंखें  खोली तो सब कुछ ठीक हो चुका था, ज्योति के सामने एक 15  साल का लड़का खड़ा था, ज्योति बोली........... बेटा डरो मत,  सब कुछ ठीक हो चुका है, आप अपने घर जाओ, ज्योति वहां से जाने लगी, लड़का ज्योति के पीछे पीछे चलने लगा,  ज्योति ने कहा........... तुम,  मेरे पीछे क्यों आ रहे हो? बेटा,  अपने घर जाओ, लड़के ने  कोई जवाब नहीं दिया,  ज्योति को लगा शायद वह घर का रास्ता भूल गया हैं,   लेकिन लड़के ने कोई जवाब नहीं दिया, ज्योति को लगा शायद यह बोल नहीं सकता, मैं इसे मार्केट में अकेला नहीं छोड़ सकती, ज्योति उस लड़के को लेकर अपने घर गई।  घर जाते ही सुनील ने पूछा...........  ये कौन है? तुम किसको ली आई,  ज्योति, सुनील को  पूरी बात बताती है, सुनील बोलता है........... चलो चलते हैं दोनों पुलिस स्टेशन, दोनों   उस लड़के को लेकर  पुलिस के पास गए और पूरी बात बताई, पुलिस ने लड़के से पूछा........... तुम कौन हो बेटा और कहां से आए हो?  तुम्हारे मम्मी पापा कहां पर हैं,  लड़के ने तुरंत जवाब दिया,  यही मेरे मम्मी पापा हैयह सुनकर सुनील और ज्योति हैरान थे कि यह लड़का झूठ क्यों बोल रहा है और यह बोल कैसे रहा है, हम तो कब से उससे बोलने की कोशिश कर रहे थे एक शब्द भी नहीं कहा,  पुलिसवाला गुस्से में........... तुम मेरा वक्त खराब करने आए हो, तुम अपने बेटे को ही लेकर आए हो, मेरे पास,  सुनील..........नहीं साहब  यह झूठ बोल रहा है,  पुलिसवाला गुस्से में........... तुम अभी यहां से चले जाओ,  ज्योति और सुनील लड़के को लेकर घर चले जाते है, घर जाकर,  सुनील ने लड़के से पूछा...........  तुमने ऐसा क्यों कहा?  लड़के ने कहा........... मैं आपका ही बेटा हूं ,ज्योति बोली...........तुम झूठ क्यों बोल रहे हो,  तुम हमारे बेटे नहीं हो, हमारा बेटा अभी 5  साल का है, लड़के ने कहा........... मैं आपका  ही बेटा हूं,  पापा, मैं आपसे यह कहने आया हूं कि, आप कोई सा भी बैग किसी से मत लेना,

मै  आपसे विनती करता हु, मत लेना, सुनील ने कहा...........तुम हो कौन? लड़के ने कहा, मैं आपका बेटा,   इतना कह कर वो  वहां से चला जाता है ।                                                                                                                                                                                                                       कुछ दिन बाद  सुनील अपने ऑफिस जाता है। थोड़ी देर बाद सुनील का बॉस उसे अपने पास में  बुलाता है और एक बैग देते हुए कहता है,  ये बेग तुम्हे जिम्मेदारी के सात दुबई ले जाना है,  ये सुनकर सुनील को उस बच्चे की याद आई की उस लड़के ने बैग के बारे में ही कहा था,  सुनील ने बॉस से पूछा इसमें है क्या?  बॉस ने कहा इसमें बोहत जरुरी चीज है, तुम्हे इसे पोहचना  है,  मै  इसके तुम्हे बोहत अच्छे पैसे दुगा,  पैसे का नाम सुनते ही सुनील ने  सोचा,  पैसे की तो बोहत जरूरत हे अभी,  में ये काम कर लेता हु।                                                                                                                                                                                                                                                                                                              अगली सुबह सुनील  बैग लेके दुबई जाने को  निकल जाता है,  रस्ते में वो सोचता है की,  बैग में ऐसा है क्या?  कही इसमें कुछ गलत तो नहीं,  क्यों न में इसे खोलके चेक करलेता हु,  मुझे संतुस्टि हो जाएगी सुनील बैग को खोलता है,  बैग में एक बॉक्स था जिसपर एक नंबर लिखा था 2019  सुनील बॉक्स खोलने की कोशिस करता है लेकिन बॉक्स नहीं खुलता,  वह उसके नंबर को  जैसे ही चेंज  करता है,  बॉक्स में से बोहत तेज रौशनी निकलती है,  सुनील को कुछ दिखाई नहीं देता थोड़ी देर बाद सुनील आंखें खोलता है और सोचता है मौसम कितना खराब है इतनी तेज बिजली कड़की है,  कुछ दिखाई भी नहीं दिया,  सुनील को समझ में नहीं आया कि यह रोशनी उस बॉक्स में से निकली थी,  सुनील टाइम देखता है उसके फ्लाइट का टाइम हो चुका था उसके फ्लाइट छूट चुकी थी,  सुनील सोचता है कि अब तो फ्लाइट छूट चुकी हैं, क्यों ना घर चला जाऊं, कल दुबई चला जाउगा सुनील जैसे ही घर जाता है,  वह अपना घर देखकर चौक जाता है 

Sunday, April 26, 2020

दस रुपए का नोट........... एक प्रेम कहानी ( तीसरा भाग)


                                                               6 महीने बाद ,                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          "रवि"  जिसने दिव्या की जान बचाई थी,  वह दिव्या को उसके घर छोड़ने आया था ।                                                                                                                                                                                 दिव्या ने अविनाश का दरवाजा खटखटाया,   एक खूबसूरत औरत ने दरवाजा खोला,  उसका नाम "सुरभी" था, सुरभी ने पूछा...........  आप  कौन?  आपको  किससे  मिलना हे?  उसने कहा मुझे,  अविनाश से मिलना है, सुरभी  अविनाश को बुलाती हे, अविनाश,  अविनाश ने पूछा   ...........  कौन है, किससे मिलना है?  सुरभी ने कहा...........  आप से, अविनाश बाहर आया और देखते ही उसे पसीना आने लगा,  अविनाश हेरान था, ऐसा कैसे हो सकता है? बहार दिव्या खड़ी थी ,दिव्या को,  देख अविनाश डर गया, दिव्या ने भाग कर अविनाश को गले लगा लिया, सुरभी को कुछ समझ नहीं आ रहा था,  सुरभी ने अविनाश से पूछा...........  ये कौन  है, ये रो क्यों रही है?    अविनाश ने कहा...........   मैं,  इसे नहीं जानता ,यह कौन है और क्यों रो रही है?  यह बात सुनकर दिव्या चौक गई और दिव्या ने कहा...........  तुम, मुझे नहीं जानते,  तुम ऐसा कैसे बोल सकते हो,  तुम मुझे कैसे भूल सकते हो?  हम तो एक दूसरे से बहुत ज्यादा प्यार करते है ।  अविनाश ने कहा...........  मैं,  तुमसे नहीं,  मैं,  अपनी पत्नी सुरभी  से प्यार करता हूं, तुम यहां से अभी चली जाओ। तुम्हारे मरने की खबर के बाद,  मैं,  तुम्हें भुला चुका था। तुम अचानक आ गई हो,  तो इसमें मेरी क्या गलती?                                                                                                                                                                                                                                                  दिव्या रोते हुए बाहर चली गई,  रवि ने पूछा........... क्या हुआ? दिव्या ने कुछ नहीं कहा,  रवि दिव्या को लेकर अपने दोस्त के घर चला गया। रवि ने,  दिव्य से पूछा........... मैं,  तुम्हें , तुम्हारी मम्मी पापा के घर छोड़ देता हूं । रवि का  दोस्त,  संतोष ने रवि से पूछा कि,  भाई बात क्या है?  रवि ने पूरी बात बताई,  संतोष...........वह ऐसा कैसे कर सकता है, उसने तुम्हें ढूंढने की कोशिश भी नहीं की और 6 महीने के अंदर शादी भी करली । संतोष ने पूछा ...........तुम्हारे पति का नाम क्या है?  दिव्या,  अविनाश कुमार, वह रहता कहां है?  दिव्या ने बताया,  संतोष कुछ सोचने लगा तो रवि ने  पूछा क्या सोच रहा  हैं, संतोष एक फोटो लेकर आया और दिव्या को कहा,  क्या इसमें अविनाश है,  दिव्या ने कहा,हा,  लेकिन, तुम कैसे जानते हो उसे। हम एक ही हॉस्टल में एक ही कमरे में रहते थे। इसलिए मैं जानता हूं, दिव्या ने कहा........... तो इससे क्या होगा? वह तुम्हारी बात नहीं मानेगा । संतोष..........  तुम उससे कब मिली?  तुम तो इस शहर की भी नहीं हो,  क्या अविनाश कभी तुम्हारे शहर गया।  दिव्या ने कहा........... नहीं,  अविनाश कभी मेरे शहर नहीं आया। दिव्या ने अविनाश से मिलने की पूरी घटना संतोष को बताइ और यह सब सुनकर संतोष चौक गया।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                 संतोष ने दिव्या से कहा कि...........  कल,  तुम,  मेरे साथ उसके घर चलना। रवि बाहर से आता है और पूछता है...........  किसके घर जाना है?  संतोष ने कहा...........  कल हम सब अविनाश के घर जाएंगे। दिव्या ने कहा...........  मैं नहीं जाना चाहती। संतोष ने कहा...........  अगर तुम नहीं जाओगी तो तुम्हें सच कभी नहीं पता चलेगा। रवि ने कहा ........... कैसा सच?  संतोष ने कहा...........वहां पर चलोगे तभी पता चलेगा।                                                                                                                                                                                     अगले दिन,   रवि,  दिव्या और संतोष, अविनाश के घर गए, संतोष ने अविनाश का दरवाजा खटखटाया और अविनाश ने दरवाजा खोला,  संतोष और दिव्या को देखकर अविनाश डर गया था,  संतोष ने अविनाश को कहा ...........और यार बड़े दिनों बाद मिला,  कैसा है तू?  अविनाश ने कहा........... मैं ठीक हूं,  तू यहां पर क्या कर रहा है और  तू  दिव्या को कैसे जनता है,  इसे यहाँ क्यों लाया?  संतोष ने कहा.......... मेरे दोस्त ने इसकी जान बचाए थी और इसे तेरे पास लेके आया और तूने इसे अपनाने से इंकार कर दिया,  तू ऐसा कैसे कर सकता है और इतने सालो का प्यार सिर्फ 6 महीने में कैसे ख़तम हो गया?   संतोष ने पूछा, अविनाश से...........  इतना घबराया हुआ क्यों है?  ऐसा लग रहा है, जैसे तेरी कोई चोरी पकड़ी गई हो। अविनाश ने कहा........... मैंने कोई गलत काम नहीं किया,  तो मैं, क्यों घबराऊ । संतोष ने कहा ...........वह तो अभी पता चल जाएगा। संतोष ने पूछा पहले, ये बता की तुझे दिव्या का खत पहली बार कहा मिला था। अविनाश ने कहा.......... एक रेस्टुरेंट में,  ये बात सुन कर दिव्या के होश उडगए, दिव्या ने कहा.......... क्या रेस्टुरेंट में, तुम झूट बोल रहे हो, संतोष ने कहा.......... दिव्या तू अभी भी नहीं समझी, ये तुम्हारा अविनाश नहीं है, जिसे तुम प्यार करती हो।                                                                                                                                                                                                                                                           दिव्या रोते हुए.......... ऐसा नहीं हो सकता। संतोष ने कहा.......... ऐसा ही हुआ है, यह तुम्हारा अविनाश नहीं है, संतोष ने अविनाश से कहा.......... सच तू बताएगा या मैं बताऊं, अविनाश ने दिव्या से माफी मांगते हुए कहा.......... दिव्या, मैं तुम्हारा अविनाश नहीं हूं, मैं संतोष के साथ एक ही कमरे में रहता था, संतोष का कोई दोस्त रोज उसे चिट्ठी देता और संतोष उसे एक दुकान पर रखकर आता और दूसरी  चिट्ठी वहां से लेकर आता।                                                                                                                                                                                     एक दिन,  मैंने सोचा क्यों ना मैं  जाकर देखूं कि, वहां चिट्ठी लेने कौन आता है? मैं वहां पर गया और जब मैंने तुम्हें देखा तो  मैं तुम्हें देखता ही रह गया। मैं तुम्हें बहुत पसंद करने लगा, मैं तुम्हें रोज देखने आता, मैंने सोच लिया था कि, मैं तुम्हें अपना बना कर रहूंगा, इसलिए जब अगली बार संतोष के दोस्त की चिट्ठी आई तो, मैंने उसे छुपा दिया और खुद एक चिट्ठी लिखी और तुमसे मिलने को कहा। दिव्या रोते हुए.......... अच्छा जब मैंने तुमसे पूछा था कि चिट्ठी की राइटिंग अलग क्यों है, तो तुमने कहा था कि मेरे हाथ में चोट लगी है, मैं कितनी बड़ी बेवकूफ थी कि मैं यह बात समझ नहीं पाई। अविनाश ने कहा.......... बिल्कुल सही कहा, उसके बाद क्या हुआ, वो सब तो तुमें पता है।  दिव्या ने संतोष से पूछा.......... इसका मतलब जो तुम्हारा दोस्त है वही मेरा अविनाश है, तुम्हारा वह दोस्त कौन है? मैंने उसके साथ धोखा किया है, संतोष, नहीं तुमने कोई धोखा नहीं किया है, धोखा तुम्हारे साथ हुआ है। दिव्या वहां से जाने लगी,  रवि दिव्या को देख कर रोने लगा, दिव्या ने पूछा तुम क्यों रो रहे हो? तुम, मुझे मेरे घर छोड़ दो,तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद तुमने और तुम्हारे परिवार ने मेरी जान बचाई, संतोष बहार आया और दिव्या से कहा.......... दिव्या तुमने  अभी तक नहीं पहचाना, तुम्हारा अविनाश कोई और नहीं,  रवि है, दिव्या जोर से रोने लगी, रवि ने कहा.......... मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, तुमने मुझे कभी धोखा नहीं दिया, धोखा तुम्हारे साथ हुआ है, रवि दिव्या को लेकर  अपने साथ अपने शहर चला गया ।

Monday, December 30, 2019

दस रुपए का नोट........... एक प्रेम कहानी (दूसरा भाग)

अगले दिन दिव्या अपने घर गई,  घर जाते ही वो रितिका से मिली और रितिका को 10 का नोट दिखाया । रितिका ने कहां...........मैंने कहा था ना,  यह नोट तुझे  जरूर मिलेगा, दिव्या बोली........... तेरी बात ठीक है लेकिन इस नोट पर देख कितना सब कुछ लिखा है। रितिका  बोली........... हां,  तेरी बात बिल्कुल ठीक है लेकिन तूने नोट को  ध्यान से  नहीं  देखा,  नोट पर बहुत कुछ लिखा  है लेकिन कुछ ऐसा भी लिखा है जो बिल्कुल अलग है। रितिका ने दिव्या को नोट दिखाया  और कहां देख ज्यादातर फालतू की बातें लिखी है लेकिन यहां पर कुछ अच्छा लिखा है "आपकी किस्मत आपके हाथो में है"  ऐसा कोई समझदार ही लिख सकता है । दिव्या बोली  तू  ठीक कह रही है,  मैंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। रितिका बोली........... तो तू  अब क्या करना चाहती हैं?  दिव्या बोली........... मुझे इन सब में नहीं पड़ना है, रितिका ने कहा कि जवाब तो दे,  क्या पता तुझे फिर से जवाब मिले, लेकिन दिव्या मना करती रह गई लेकिन रितिका ने उस पर फिर से लिख दिया। रितिका ने दिव्या से कहा कि यह नोट तू  वापस उसी दुकानदार को दे देना। दिव्या  बोली........... में यह सब नहीं करने वाली, रितिका ने कहा यार  कर ले,  क्या पता तुझे कोई बहुत खास मिल जाए  । दिव्या फिर से रितिका की बात मान  गई ।                                                                                                                                                                                                                          कुछ हफ्तों बाद दिव्या वापस चली गई,  वहां पर जाकर उसने नोट उसी दुकानदार को दे दिया। कुछ दिनों बाद दिव्या आकांक्षा को लेकर उसी दुकान पर गए और कुछ सामान खरीदा दुकानदार ने फिर से उसे वोट दिया नोट पर फिर से कुछ लिखा था।                                                                                                                                                                                                                                                                           इसी तरह से यह सिलसिला चलता रहा,  दिव्या बहुत खुश थी। आकांक्षा,  दिव्या से बोली........... तू  पागल है, इस तरह से हमें किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए,  तूने उसका नाम पूछा,  दिव्या बोली...........नहीं। अगले दिन दिव्या ने  उससे उसका नाम पूछा, उसने अपना नाम अविनाश बताया। दिव्या अविनाश सेसे बात करके बहुत खुश होती,  धीरे-धीरे करके नोट पर लिखना बंद कर दिया और चिट्टियां लिखना चालू कर दिया, चिट्टियां जैसे तैसे करके दोनों के पास पहुंचती। दोनों एक दूसरे से कभी नहीं मिले।                                                                                                                                                                                                                        एक साल तक चिट्टियो का सिलसिला चलता रहा। एक दिन अचानक दिव्या को अविनाश की चिट्ठी मिली ,   उसमें लिखा था,  मैं तुमसे मिलना चाहता हूं,  यह चिट्टी कुछ अलग थी,  उसकी लिखावट भी कुछ अलग थी, दिव्या ने चिट्ठी लिखी और पूछा तुम्हारी लिखावट अलग है लेकिन में तुमे  पहचानूगी  कैसे?   अविनाश ने कहा कि मेरे हाथ में चोट लगी है  इसलिए मैं ढंग से लिख नहीं पा रहा हूं,  हम उसी दुकान पर मिलेंगे। दिव्या बहुत  परेशान हो जाती हैं और अविनाश की  बताइ  हुइ जगह पर उससे मिलने चली जाती है।  अविनाश को देखकर दिव्या  बहुत खुश हो जाती है ।                                                                                                                                                                                                                                                                 कुछ दिन बाद अविनाश ने दिव्या को शादी के लिए कहा,  दिव्या बहुत खुश थी। दिव्या के परिवार वाले भी मान गए  औरअविनाश और दिव्या की शादी हो गई, दोनों बहुत खुश थे।                                                                                                                                                                                                                                                तीन  महीने बाद,  एक दिन  दिव्या क्लीनिक से अपने घर आ रही थी, घर आते समय रास्ते में एक पुल पड़ता है और पुल से गुजरते समय  पुल टूट गया, दिव्या नीचे समुंद्र में गिर गई, समुंद्र का बहाव इतना तेज था कि, उसे कोई बचा नहीं सका ।  

Saturday, December 28, 2019

दस रुपए का नोट........... एक प्रेम कहानी (पहला भाग)


यह कहानी दिव्या और अविनाश की है। दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते हैं, लेकिन एक दूसरे से बिल्कुल अनजान ।   दिव्या बहुत चंचल थी । वह  हमेशा अपने दोस्तों को परेशान करती ।                                                                                                                                                                                                                                           स्कूल के पास एक छोटी सी चाय की दुकान थी। दिव्या और दिव्या के सभी दोस्त उस दुकान पर गए हैं और सब ने मिलकर चाय पी, तभी दिव्या की दोस्त रितिका ने दस  का नोट निकाला और उस नोट पर लिख दिया,  "तुम ही मेरी किस्मत हो"   रितिका ने नोट दिव्या को दिया और कहा,  यह नोट तुम चाय वाले को दे दो..........  दिव्या ने पूछा .......... तू करना क्या चाहती है? रितिका बोली.......... अगर इस नोट पर जो लिखा है उसका जवाब आया तो तुम्हें उसके आगे भी उसे जवाब देना होगा। दिव्या ने कहा कि..........यह  फालतू का काम है,  मैं यह नहीं करना चाहती। रितिका हंसने लगी,  बस डर गई,  दिव्या बोली.......... नहीं मैं डरी नहीं। दिव्या ने रितिका से वह नोट लिया और चाय वाले को दे दिया। वहां से सभी दोस्त चले गए। दिव्या..........  रितिका से,  यह सब क्यों करना चाहती  हैं,  कुछ ही महीनों में स्कूल बंद हो जाएगा,  हमारी पढ़ाई खत्म हो जाएगी और हम इस स्कूल से चले जाएंगे, इस नोट का  करना क्या चाहती हैं?  रितिका बोली.......... पता नहीं,  क्या पता तेरी किस्मत जुड़ जाए,  इस नोट से,  क्या पता तुझे कोई मिल जाए?  दिव्या हंसने लगी,  तू पागल है,  ऐसा नहीं होता और उस नोट पर कोई भी कुछ नहीं लिखेगा तू देख लेना,  रितिका बोली..........वह तो पता चल जाएगा, "दो दिन बाद" ।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                   दो  दिन बाद रितिका और दिव्या चाय की दुकान पर गई और चाय वाले से कहा की ऐसा कोई 10 का नोट है जिस पर कुछ लिखा है। दुकानदार बोला..........  नहीं, उसने  चेक किया लेकिन उसे ऐसा कोई नोट नहीं मिला। दिव्या बोली.......... देखा मैंने कहा था ना,  यह सब फालतू का काम है। रितिका और दिव्या वहां से चले जाते हैं।  कुछ महीनों बाद  दिव्या और रितिका 12वीं पास करके स्कूल से चली  जाती  हैं।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             तीन  साल बाद दिव्या बड़े शहर में  मेडिकल की तैयारी करने चली जाती है। वहां पर उसे आकांक्षा मिलती है, जो उसकी बहुत अच्छे दोस्त बन जाती है।                                                                                                                                                                                                                                                                                     एक  दिन की बात है,   आकांक्षा और दिव्या बाहर घूमने जाते है। आकांक्षा एक दुकान से कुछ  सामान खरीदती  हैं। दुकानदार उसे  कुछ पैसे वापस करता है, उसमें से एक नोट पूरी  स्याही से लिखा हुआ, आकांक्षा ने  नोट दुकानदार को दिया और कहा यह नोट नहीं चलेगा,  आप दूसरा नोट देदो, दुकानदार कहता है.......... सभी यही बोलते हैं, पता नहीं किस बेवकूफ ने इस पर यह लिखा था, यह नोट पूरा भरा हुआ है, कोई इसे लेना ही नहीं चाहता है, आकांक्षा दुकानदार से बहस करने लगती है, तभी दिव्या उसके पास आती  हैं और पूछती  हैं, क्या हुआ आकांक्षा कहती है? आकांक्षा.......... अरे यार देख इस नोट पर कुछ लिखा हुआ है,  दिव्या नोट को देखकर हैरान हो जाती है कि, यह तो वही 10  का नोट है और वह उस नोट को ले लेती हैं और वहां से आकांक्षा को लेकर चली जाती है। आकांक्षा बोलती हैं.......... तू पागल है,  यह नोट कौन लेगा?  पूरा भरा  हुआ है,  कहीं भी कुछ बचा नहीं है। दिव्या आकांक्षा को पूरी बात बताती हैं, आकांक्षा बोलती है.......... तू और तेरी दोस्त दोनों पागल है, इस नोट पर इतना सब कुछ लिखा है, तुझे कैसे पता चलेगा कि इनमें से कौन अच्छा है?  ऐसा कोई करता है, दिव्या बोलती है..........तू बिल्कुल ठीक कह रही है ।                                  

Wednesday, September 4, 2019

साहसी रेनू और राक्षस (तीसरा भाग)


रेनू और गोपाल ट्रेन का इंतजार करते हैं। शाम होने वाली थी । रेनू,  गोपाल से बोलती है............ गोपाल, कुछ ही घंटों में ट्रेन आ जाएगी,  लेकिन हम ट्रेन में सभी लोगों को समझा तो लेंगे,  लेकिन जो छोटे बच्चे हैं वह थोड़ी समझेंगे उनकी नींद अगर खुल गई तो उन्होंने राक्षस को देख लिया तो । गोपाल बोलता है............ तुम फिकर मत करो,  मेरे पास कुछ जड़ी बूटियां है जो मैं सभी बच्चों को दे दूंगा वह थोड़ी-थोड़ी खा लेगे । रेनू पूछती है............ कैसी जड़ी बूटी?  गोपाल कहता है............ यह जड़ी बूटी खाने से नींद आती है और इससे किसी को कोई नुकसान भी नहीं होगा। रेनू पूछती हैं............ तुमको कहां से मिली यह जड़ी-बूटी?  गोपाल ने कहा............ मैंने जंगल में ढूंढा तो मुझे यह जड़ी बूटी मिल गई। रेनू बोलती है............ यह तुमने अच्छा किया।                                                                                                                                                                                                                        आधी रात हो  चुकी थी। ट्रेन आकर जंगल में रुक गई,  जैसे ही ट्रेन रुकी,  रेनू और गोपाल ट्रेन में चढ़ गए और सभी पैसेंजर को सारी बात बताने  लगे,  सारे पैसेंजर बहुत डरे हुए थे। गोपाल  ने कहा............ डरो मत,  यह जड़ी-बूटी अपने बच्चो  को थोड़ी थोड़ी खिला दो ताकि उन्हें नींद आ जाए। कुछ ही देर में वह राक्षस ट्रेन में आएगा,  कोई भी मत उठना, सभी लोग सोए रहना चाहे,  कुछ भी हो जाए,  सभी पैसेंजर बोलते हैं............ ठीक है,  हम तुम्हारी बात जरूर मानेंगे। रेनू, गोपाल ट्रेन से उतर जाते हैं तभी वह देखते हैं कि राक्षस ट्रेन के पास खड़ा है। राक्षस इंतजार कर रहा था कि कोई बच्चा उसे देखें लेकिन कोई भी बच्चा उसे नहीं देख रहा था। वह ट्रेन के अंदर गया लेकिन ट्रेन में सभी लोग सो रहे थे, कोई हलचल नहीं थी। राक्षस ध्यान से हर जगह देखने लगा, सभी बच्चों ने तो नींद की जड़ी-बूटी खाई थी तो वह कहां जगने वाले थे। राक्षस ने  थोड़ा इंतजार किया लेकिन कोई नहीं जगा, राक्षस वहां से चला गया और ट्रेन भी चालू हो गई, जैसे ही ट्रेन गई राक्षस जाने लगा। रेनू और गोपाल राक्षस का पीछा करने लगे, थोड़ी दूर जाकर एक छोटी सी कुटिया थी,  उस कुटिया में राक्षस चला गया। रेनू और गोपाल कुटिया के बाहर खड़े होकर अंदर देखने लगे,  अंदर सभी बच्चे थे,  रवि भी लेकिन रेनू बहुत दंग थी  कि कोई भी बच्चा उस राक्षस से डर क्यों नहीं रहा?  सभी उसे देखकर खुश क्यों हैं?  वह समझ नहीं पाती। गोपाल कहता है............ अभी राक्षस बाहर जाएगा तो हम अंदर जा के सभी बच्चों को बचा लेंगे। रेनू बोली............ ठीक है।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                        थोड़ी ही देर में राक्षस बच्चों के लिए खाना लेने बाहर गया,  तभी रेनू और गोपाल कुटिया के अंदर गए,  रवि भाग कर आया और रेनू को गले लगा लिया। रेनू............ मेरे भाई,  तू ठीक है ना,  मुझे तेरी बहुत चिंता हो रही थी,  राक्षस ने तेरे साथ कुछ किया तो नहीं। रवि बोलता है............ नहीं दीदी,  वह तो बहुत अच्छा है। रेनू बोलतीहै............ क्या?  अच्छा है,  तू कैसी पागलों वाली बातें कर रहा है?  रवि............नहीं दीदी मैं सही कह रहा हूं, वह सच में बहुत अच्छा है,  वह सभी बच्चों से बहुत प्यार करता है  और सबका बहुत ख्याल रखता है । सभी बच्चे बोलते हैं............ हां दीदी,  वह राक्षस वह हमारा बहुत ख्याल रखता है । रेनू और गोपाल समझ नहीं पाते की यह हो क्या रहा है? बच्चे बोल क्या रहे हैं?  लगता है राक्षस ने इन्हें मोहित कर लिया है। रेनू,  रवि से कहती हैं............ मेरे भाई,  राक्षस ने  तुम लोगों को सम्मोहन में ले रखा है इसलिए तुम लोग ऐसी बातें कर रहे हो । रवि............ नहीं दीदी,  ऐसा कुछ भी नहीं है, हमें राक्षस ने कोई सम्मोहन में नहीं किया है।                                                                                                                                                                                                                   वहां पर सभी बच्चे 4 साल से लेकर 15 साल तक की उम्र के थे। थोड़ी ही देर में राक्षस कुटिया में वापस आ जाता है। राक्षस रेनू और गोपाल को देखकर बहुत गुस्सा करता है। तुम  लोग कौन हो ? तुम यहां पर क्या कर रहे हो ?  तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी कुटिया में आने की?  तुम लोग अभी और इसी वक्त यहां से चले जाओ,  नहीं तो बहुत बुरा होगा,  तुम्हारे साथ,  तभी रवि बोलता है............ नहीं राक्षस भैया,  यह मेरी दीदी है, आप इन्हे कुछ मत करना,  मैं उनसे बहुत प्यार करता हूं। राक्षस बोलता है............ ठीक है,  लेकिन इन्हें बोलो यह अभी यहां से चले जाए । रेनू बोलती  हैं............ नहीं,  मैं नहीं जाऊंगी,  मैं अपने भाइ को और इन बच्चों को अपने साथ लेकर जाऊंगाी । राक्षस बहुत गुस्से में आ जाता है............ तुम इन्हें नहीं ले जा सकती। रेनू,  राक्षस को कहती है कि............ तुमने इन बच्चों को क्यों पकड़ के रखा है?  इन मासूम बच्चों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?  रेनू बोलती  हैं............ मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूं,  तुम मेरे भाई और इन बच्चों को यहां से जाने दो,  उनके मम्मी पापा बहुत दुखी हैं। राक्षस बोलता है............ तो फिर मेरा क्या होगा?  मैं फिर से अकेला हो जाऊंगा। रेनू बोलती है............ मतलब,  तुम कहना क्या चाहते हो? राक्षस कहता है कि............ हम नो  भाई थे । ट्रेन का डिब्बा पलटने से मेरे 8 भाई मर गए लेकिन मैं दुर्भाग्यवश बच गया और एक गड्ढे में जा गिरा। मैं 4 दिनों तक उस गड्ढे  में रहा। मैं तो उस गड्ढे से निकल भी नहीं पा रहा था,  क्योंकि मैं सिर्फ 6 साल का था,  तभी एक बाबा आए और उन्होंने मुझे वहां से निकाला ।वह बहुत चमत्कारी बाबा थे । उन्होंने मुझे अपनी सारी शक्तियां सिखाई,  उन्होंने मुझे कहा था कि अगर तुम अपने भाई की उम्र के लोगों को मेरे पास लेकर आओगे तो मैं उनके अंदर तुम्हारे भाइयों की आत्मा डाल  दूंगा, तब तुम उनके साथ खुशी-खुशी रहना।                                                                                                                                                                                                                                                                                    लेकिन,  कुछ दिनों में ही चमत्कारी बाबा की मृत्यु हो गई,  मैं बहुत रोया कि मैं फिर से अकेला हो गया,  लेकिन मेरे पास बाबा की शक्तियां थी,  इसलिए जब भी कोई ट्रेन आती और जब भी कोई बच्चा मुझे देखता तो मैं उसे उठा लेता। मेरे भाइयों की आत्मा तो उनमें नहीं आ सकती लेकिन मैं उन्हें अपने भाइयों की तरह ही प्यार करता हूं । रेनू कहती हैं............ मैं तुम्हारी भावनाओं को समझ सकती हूं लेकिन उनके भी माता-पिता -भाई बहन है,  वह भी बहुत दुखी होंगे, तुमने क्या यह सब नहीं सोचा? राक्षस बहुत दुखी होता है............ मैंने बहुत गलत किया। रेनू पूछती हैं............ तुम कितने साल के हो। राक्षस कहता  हैं............ मैं 14 साल का हूं। रेनू कहती है............ तुम तो मेरे रवि की उम्र के हो, तो तुम भी मेरे भाई हुए। राक्षस ने कहा............ तुमने मुझे अपना भाई कहा। रेनू कहती हैं............ हां,  तुम भी मेरे भाई हो,  अब  तुम्हें किसी भी बच्चे को उठाने की जरूरत नहीं है। मैं तुम्हें अपना भाई बनाती हूं,  मैं तुम्हें अपने साथ रखूंगी,  अब तुम मेरे साथ रहोगे । राक्षस,  रेनू को पकड़ के रोने लगता है। राक्षस कहता है............ दीदी लेकिन क्या समाज मुझे अपना पाएगा। रेनू कहती है............ क्यों नहीं?  तूने क्या गलत किया है?  तुम तो खो गए थे,  तुम्हें तो इस दुनिया के बारे में पता भी नहीं है। मैं तुम्हें इंसान बनाऊंगी और बहुत अच्छा इंसान बनाऊंगी और मेरी नानी भी तुम्हें बहुत प्यार करेगी । रवि कहता है........... हां, राक्षस भैया,  मेरी नानी भी आपसे बहुत प्यार करेगी।                                                                                                                                                                                                                                              रेनू,  राक्षस और सभी बच्चों को लेकर वहां से चले जाती हैं और अपनी  नानी के घर पहुंच जाती हैं। रेनू, नानी को पूरी बात के बारे में बताती है। नानी  ने राक्षस को गले लगाया   हैं। नानी कहती है............  बेटा तुम कोई राक्षस नहीं हो,  तुमने अपने आप को राक्षस क्यों समझा? तुम एक बच्चे हो,  मेरे रवि की तरह,  नानी राक्षस को नहलाती हैं, अच्छे से तैयार करती हैं और वह बिल्कुल एक आम लड़के की तरह दिखने लगता है । नानी कहती है............  देखा  अब कोई पहचाने गा भी नहीं तुम्हें कि,  तुम कभी राक्षस के रूप में थे,  तुम तो इंसान हो । अब तुम मेरे परिवार का एक हिस्सा हो । रेनू नानी से कहती हैं............  नानी इन सभी बच्चों का क्या करें?  नानी ने कहा............  हमें इन्हें पुलिस को सौंप देना चाहिए,  वह उन्हें उनके घर पहुंचा देंगे नानी  और रेनू पुलिस स्टेशन जाते हैं और पुलिस को पूरी घटना के बारे में बताते हैं । नानी राक्षस के  बारे में कुछ नहीं बताती। पुलिस सभी बच्चों को उनको उनके मां-बाप को देते हैं। अब रेनू,  रवि और राक्षस जिसका नाम नकुल रखा गया सभी लोग नानी के साथ रहते हैं और बहुत खुश रहते हैं । बचपन में ही खो जाने की वजह से नकुल अपने आप को राक्षस  समझता था । उसे नहीं पता था  कि वह इंसान है और एक  छोटा सा बच्चा है। 

Tuesday, September 3, 2019

साहसी रेनू और राक्षस (दूसरा भाग)


                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                 रेनू अपनी  नानी के पास पहुंच जाती है। नानी दरवाजे पर ही खड़ी थी। वह रेनू को देखकर बहुत खुश हुई। नानी ने रेनू को गले लगाया, नानी इधर-उधर देखने लगी। नानी ने रेनू से पूछा............ रवि कहां है? वह क्यों नहीं दिख रहा? क्या वह तुम्हारे साथ नहीं आया?  रेनू जोर-जोर से रोने लगती है। नानी कहती है क्या हुआ? क्यों रो रही हो?क्या बात है?  रेनू कल रात की पूरी घटना नानी को बताती है। नानी ने रेनू से कहा कि, जब तुम गांव आने वाले ही थे, तो मुझे फोन क्यों नहीं किया? रेनू ने कहा............ हम आपको बहुत खुश देखना चाहते थे, हमारे आने पर, लेकिन मुझे नहीं पता था कि, ऐसा हो जाएगा। नानी ने कहा............अगर तुमने मुझे फोन किया होता तो ऐसा कुछ भी नहीं होता। रेनू सोच में पड़ जाती है,  क्यों नानी आप ऐसा क्यों बोल रहे हो?  नानी ने कहा कि............ मुझे पता है कि जिस रास्ते पर ट्रेन रुकी थी, वह रास्ता बहुत खराब है, उस रास्ते पर ट्रेन रूकती ही है, सिग्नल हो,  चाहे,  ना हो। रेनू कहती है............ ऐसा क्यों नानी? नानी  बोलती है............ वहां पर कुछ अजीब है, जो ट्रेन को रोक देता है। रेनू नहीं समझ पाती है, नानी बोलती है............ मैं समझ सकती हूं बेटा,  तुम्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा,  चलो मैं तुम्हें किसी से मिलाती हूं। रेनू पूछती है ............किससे नानी? नानी,  अपने बगल के घर में रेनू को ले जाती है। वहां पर एक औरत थी,  जिसका नाम सुशीला था। रेनू, सुशीला को देखती है और नानी से पूछती है............ नानी क्या हुआ है? नानी,  रेनू को बताती है कि............ 4 साल पहले यह भी उसी ट्रेन से अपने गांव आ रही थी, अचानक ट्रेन जंगल में रुकी, सुशीला का 4 साल का बेटा था, वह खुशी-खुशी अपने  गांव आ रही थी, लगभग रात के 1:00 या 2 :00 बजे होंगे,  अचानक एक अजीबो गरीब आदमी आया और उसने सुशीला के बेटे को ले जाने को कहा सुशीला ने बहुत मना किया लेकिन वो नहीं माना और वह सुशीला के बेटे को ले गया,  तब से सुशीला की यह हालत है। रेनू पूछती है कि............ नानी वह ऐसा क्यों कर रहा है?  उसे इस से क्या मिलेगा?  नानी कहती है कि............ जिस बच्चे की नजर उस पर पड़ जाती हैं, वह उसे लेकर ही जाता है और हां वह सिर्फ 1 साल से लेकर 15 साल तक के बच्चों को ही ले जाता है। रेनू  पूछती है............ ऐसा क्यों नानी?                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          नानी  ने कहा............ लगभग 10 साल पहले उसी रास्ते से एक ट्रेन जा रही थी । दुर्भाग्यवश ट्रेन का एक डिब्बा पलट गया और उसमें 9 भाई थे, नो के नो भाइयों की उसी वक्त मौत हो गई लेकिन ट्रेन में बैठे किसी भी आदमी को एक खरोच तक नहीं आई। बस अब नो  भाइयों की वहीं पर मौत हो गई लेकिन जब उन्हें निकाला गया तो सिर्फ 8 भाई ही मिले नोवा भाई नहीं मिला,  वह सभी भाई 4 साल से 15 साल तक की उम्र के थे,  वह अपने माता-पिता के साथ अपने घर जा रहे थे । जब से यह घटना घटी हैं तब से ही यह सिलसिला चालू है । अब तक उस सुनसान जगह से 8 बच्चे गायब हो चुके हैं,  सब कहते हैं कि वह उन बच्चों को उठाता है जो उन 9 बच्चों की उम्र के थे, अब तक 8 बच्चे उठा चूका है,  जैसे ही नोवा बच्चा उठा लेगा, वह वहां से गायब हो जाएगा और हां,  रेनू बेटा,  हमारा रवि आठवां था। रेनू कहती है............ इसका मतलब,  नानी,  अब वह नोवा बच्चा उठाएगा, तो वहां से गायब हो जाएगा । रेनू कहती है............मैं ऐसा नहीं होने दूंगी,  मैंने रवि से वादा किया है कि,  मैं उसे जरूर बचाने आऊंगी। नानी बोलती है............लेकिन बेटा तुम अकेले यह कैसे करोगी?  रेनू ने कहा............ नानी मैं अपने भाई को जरूर बचाने जाऊंगी, मैं उसे नहीं खो सकती। नानी ने कहा............ ठीक है,  बेटा,  तुम जाओ लेकिन तुम्हें आज ही जाना होगा क्योंकि कल ट्रेन आने वाली  हैं और तुम्हें वह सब रात को ही मिलेंगे। दिन में वहां कोई जंगल नहीं मिलेगा । वह एक मायावी जगह है इसलिए तुम्हें रात को ही जाना होगा। रेनू ने कहा............ठीक है नानी,  मैं रात को ही जाऊंगी।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  उसी दिन आधी रात को  रेनू उसी जगह पर गई और अपने भाई को ढूंढने लगी । रवि कहां हो तुम?  मुझे जवाब दो,  रवि कुछ बोलो,  लेकिन कोई आवाज नहीं आती। अचानक उसे एक आदमी दिखाई पड़ता है,  रेनू डर जाती  हैं,  कहीं यह राक्षस तो नहीं,  वह आदमी रेनू की तरफ बढ़ने लगता है,  रेनू बहुत घबराई हुई थी। रेनू ने कहा............तुम कौन हो? मैं तुम से नहीं डरती, तुम यहां से चले जाओ, तुम मेरे भाई को मुझे वापस कर दो,  तुम यहां से चले जाओ,  तभी वह आदमी रेनू के पास आता है, रेनू , उसे देख कर चौक जाती है, वह आदमी कोई और नहीं, गोपाल था।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                        रेनू बोलती हैं............ गोपाल,  तुम,  तुम यहां पर क्या कर रहे  हो?  तुमको किसने बताया कि मैं यहां पर हूं?  गोपाल बोलता है............ मैं तुम्हारी नानी के घर गया था, तो उन्होंने बताया तुम  यहां पर हो, इसलिए मैं तुम्हारी मदद करने आया  हूं। रेनू कहती है............ नहीं,  तुम यहां से चले जाओ मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से किसी की जान जाए ।गोपाल बोलता है............ नहीं मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा हम दोनों मिलकर रवि को ढूढेंगे । रेनू जोर-जोर से रोने लगती है,  पता नहीं मेरा भाई कहां होगा?  रेनू और गोपाल,  रवि को ढूंढने लगते हैं,  लेकिन उन्हें रवि कहीं नहीं मिलता,  दोनों थक जाते हैं और अब तो सुबह भी होने वाली थी । रेनू बहुत परेशान होती हैं कि अब तो सुबह हो चुकी है, वह तो अब बिल्कुल नहीं मिलेंगे, हमें आधी रात का इंतजार करना होगा। लेकिन आज तो ट्रेन भी आने वाली  हैं,  आज वह राक्षस नोवे बच्चे को उठाएगा।  गोपाल कहता है............ नोवा बच्चा,  मतलब। रेनू कहती है............ यह बहुत बड़ी कहानी है, मैं तुम्हें बाद में बताऊंगी । रेनू कहती है............अगर राक्षस आज नोवा बच्चा  ले गया तो,  वह हमेशा के लिए गायब हो जाएगा और मेरा रवि मुझे कभी नहीं मिलेगा। गोपाल कहता है............ हम ऐसा कुछ नहीं होने देंगे, हम इंतजार करेंगे,  उस राक्षस का। गोपाल कहता है............ ऐसा करते हैं, जैसे ही ट्रेन आएगी हमें सभी ट्रेन वालों को चौकन्ना करना होगा कि, कोई भी जागे नहीं जितने भी 1 साल से लेकर 15 साल तक के बच्चे हैं,  सभी को छुपा ले अगर कोई बच्चा उसे नहीं देखेगा तो वह किसी को नहीं ले जा पाएगा और हमें और टाइम मिल जाएगा। रेनू कहती है............ तुम बिल्कुल  ठीक बोल रहे हो।

Monday, September 2, 2019

साहसी रेनू और राक्षस (पहला भाग)

यह कहानी दो 👬 भाई बहनों की है। रेनू और रवि......दोनों भाई बहन अपनी नानी के साथ रहते हैं क्योंकि,  जब वह छोटे थे,  तभी उनके माता-पिता गुजर गए,  तो उनकी नानी ने उन्हें पाला पोसा। रवि और रेनू अपनी  नानी के साथ उनके गांव में रहते हैं। नानी ने  रेनू और रवि को बड़े शहर पढ़ने को भेजा हुआ था ।                                                                                                                                                                                                                                           कई वर्षों बाद दोनों अपनी नानी से मिलने गांव जाने वाले थे। रेनू बड़ी थी रवि छोटा............आज शाम 6:00 बजे,  दोनों की ट्रेन थी,  दोनों समय पर रेलवे स्टेशन पहुंच गए और ट्रेन में बैठ गए । नानी के गांव जाने में पूरे 20 घंटे लगते थे । ट्रेन चालू हो चुकी थी,  दोनों भाई बहन बहुत खुश थे कि वह नानी के पास जा रहे हैं,  इतने सालों बाद,  नानी बहुत खुश होगी। सभी ट्रेन में सो जाते हैं। रेनू भी रवि को बोलती है कि तुम भी सो जाओ ।                                                                                                                                                                                               रात  के लगभग 1:00 बज रहे थे  और ट्रेन एक सुनसान रास्ते पर रुक गइ ,  जहां पर सिर्फ जंगल ही जंगल था। अचानक रवि की नींद खुलती  हैं,  वह रेनू से कहता है............दीदी ट्रेन जंगल में रुकी है............रेनू बोलती हैं, तू  सो जा सिग्नल नहीं होगा इसलिए ट्रेन रुकी होगी अभी ट्रेन थोड़ी देर में चलेगी। लगभग 1 घंटे हो जाते हैं लेकिन ट्रेन नहीं चलती,  रवि बोर हो जाता है उसे नींद ही नहीं आ रही थी, वह अपना फोन चलाने लगता है, बाहर इतना अंधेरा था कि कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। रवि ने अपने फोन की टॉर्च जलाइ और बाहर का नजारा देखने लगा, तभी उसे अचानक दो चमकती हुई आंखें दिखी,  रवि डर गया । रवि बोलता है............ दीदी उठो बाहर कोई है?  रेनू बोली............ तू अभी तक सोया नहीं मैंने तुझे कहा ना तू सो जा तू टॉर्च क्यों जला रहा है?  तू सोता क्यों नहीं?  रवि बोलता है............नहीं दीदी बाहर कोई था, उसकी आंखें चमक रही थी । रेनू बोलती है............तेरा वेहम होगा, वह जुगनू होंगे, गांव में जुगनू भी होते हैं सो जा, अब सिर्फ 5 घंटे बाकी हैं,  नानी का गांव आने में............रवि रेनू सो जाते हैं,  लेकिन रवि को बार-बार वही  नजर आ रह था । रवि फिर उठता है और  उसे फिर से वह दोनों आंखें नजर आती  हैं, वह डर जाता है और चिल्लाने लगता है, ट्रेन में लगभग सभी लोग उठ जाते हैं। क्यों चिल्लाया क्या हुआ, सभी लोग रवि से पूछते हैं?  रवि बोलता है............बाहर कोई है,  ट्रेन में सभी लोग बाहर देखने लगते हैं लेकिन कुछ नहीं होता है। रवि कहता है............नहीं कुछ तो था। सभी रवि को डांटने लगते हैं कि इतनी रात को तुम मोबाइल क्यों चला रहा है, तूने मोबाइल में ही कुछ देखा होगा, तू  चुपचाप सो जा ।                                                                                                                                                                                                                                                                     थोड़ी देर में ही ट्रेन चालू हो जाती  हैं। ट्रेन में बहुत अंधेरा होता है। रवि को बहुत डर लग रहा था । उसने सोचा क्यों ना मैं लाइटजलालु उसने जैसे ही लाइट जलाई ऊपर कि सीट पर एक अजीबो गरीब आदमी बैठा हुआ था। रवि डर गया और चिल्लाने लगा, सभी ट्रेन वाले फिर से उठ गए।  अब क्या हुआ, फिर क्यों चिल्लाया ?  रवि बोला............ऊपर कोई बैठा है, बहुत अजीब है और उसकी आंखें बहुत चमक रही हैं। ट्रेन में एक आदमी बोला............तू फिर से चालू हो गया अब तू चिल्लाया तो तुझे में  ट्रेन से उतार दूंगा । रेनू बोलती है............नहीं भाई,  बच्चा है,  डर गया है,  माफी मांगती हूं मैं आपसे,  रेनू रवि को डाटती है और बोलती है............तू अब  सोएगा,  मुझे अपना मोबाइल दे,  दिन भर मोबाइल चलाता है। रेनू,  रवि का मोबाइल ले लेती  हैं। रवि को कहां नींद आने वाली थी। वह बहुत डरा हुआ था,  उसकी बात पर कोई विश्वास नहीं कर रहा था । रवि ने सोचा,  फिर से एक बार बाहर देखूं कोई है तो नहीं,  वह देखने लगा तभी नीचे की सीट पर फिर से वही आदमी बैठा था,  रवि फिर चिल्लाया। रेनू उठी और बोली............तू  फिर चिल्लाने लगा,  नहीं दीदी,  वहां देखो कोई बैठा है। रेनू ने देखा तो वहां पर सच में  कोई बैठा था,  रेनू भी डर गई,  यह क्या चीज है,  यह तो बहुत अजीब है,  दिख भी नहीं रहा है,  सिर्फ आंखें ही चमक रही है। जिस सीट पर बैठा था, उस पर एक आदमी सोया था। रवि उसे बुलाता है............अंकल उठो, अंकल उठो,  आदमी बोलता है............क्या रे तूने तो सबको परेशान कर दिया,  क्या हुआ क्यों उठा रहा है, मुझे?  अंकल आपके पैर के पास कोई बैठा है............कौन बैठा है मेरे पैर के पास,  जैसे ही आदमी ने उठकर देखा एक अजीबो गरीब आदमी उसके पास बैठा था, वह डर  गया और चिल्लाने लगा । सभी ट्रेन वाले उठ गए, तभी वह आदमी भी गायब हो गया सभी पूछने लगे क्या हुआ,  फिर से लड़का, चिल्लाया क्या?                                                                                                                                                                                                                                                                                  रवि,  रेनू और वह आदमी बहुत डरे हुए थे ।आदमी बोला............नहीं नहीं यहां पर सच में कोई था,  यह लड़का झूठ नहीं बोल रहा है,  सभी ट्रेन वाले डर जाते हैं, बोलते हैं क्या था?  रवि कहता है............पता नहीं क्या था?  कुछ समझ में नहीं आया बहुत अजीब था उसके पैर नहीं थे। सभी ट्रेन वाले बहुत डरे हुए होते हैं। वह कहते हैं कि चलो पुलिस को फोन करें क्या पता कोई चोर घुस आया हो?  रेनू फोन लगाती हैं, लेकिन नेटवर्क नहीं था । सभी लोग फोन लगाने की कोशिश करते हैं लेकिन किसी के भी फोन में नेटवर्क नहीं था। सभी बोलते हैं............एक साथ सब का नेटवर्क कैसे जा सकता है? कुछ तो गड़बड़ है हमें ड्राइवर को यह बात बतानी पड़ेगी,  तभी एक आदमी ड्राइवर की ओर  जाने लगता है,  तभी वह अजीबो गरीब आदमी उसके सामने आ जाता है। इस बार सबने उसे देखा वह एक राक्षस था। सब डर जाते हैं, सब चिल्लाने लगते हैं तुम कौन हो तुम्हें क्या चाहिए?  वह रवि की तरफ इशारा करता है। रेनू, रवि को अपनी तरफ खींच लेती हैं,  बोलती है............मेरा भाई क्यों?  फिर से राक्षस  रवि की तरफ इशारा करता है और बोलता है............यह चाहिए, यह लड़का चाहिए............रेनू बोलती है............नहीं मैं अपना भाई तुम्हें नहीं दूंगी। ट्रेन में सभी लोग डरे होते हैं कोई भी ड्राइवर के पास पहुंच नहीं पाता,  जो भी कोशिश करता,  राक्षस उसे चोट पहुचाता , सभी ट्रेन में थे, कुछ लोग रेनू और रवि की तरफ से थे, तो कुछ लोग यह बोल रहे थे कि क्यों ना तुम इस लड़के को उस राक्षस को दे दो कम से कम हम सबकी जान तो बचेगी?                                                                                                                                                                                                                                                             रेनू बोलती है............ तुम लोग क्या कह रहे हो? तुम चाहते हो मैं अपने भाई को इस राक्षस कर दे दूं,  मैं ऐसा नहीं करूंगी। सभी ट्रेन वाले बोलते हैं............तो तुम क्या चाहती हो कि एक जान के बदले हजारों जाने चली जाए?  रवि बहुत रोता है............दीदी मैं नहीं जाऊंगा इस राक्षस के साथ............रेनू  कहती है............मैं तुझे नहीं जाने दूंगी तू डर मत । उसी ट्रैन में एक लड़का था ।गोपाल।  गोपाल बोलता है............तुम डरो मत, मैं तुम लोगों के साथ हूं, यह राक्षस तुम्हारा कुछ नहीं करेगा हम रवि को इसे  नहीं देंगे। ट्रेन वाले चिल्लाने लगते हैं कि,  नहीं इस लड़के को राक्षस को सौंप दो तभी हम लोग बचेंगे। जो भी रवि को बचाने की कोशिश करता,  राक्षस उसे घायल करदेता,  राक्षस ने  किसी को   जान से नहीं मारा था,  लेकिन कई लोग बहुत गंभीर रूप से घायल थे । ट्रेन में सभी लोग बोलने लगे कि,  तुम्हें रवि को राक्षस को देना होगा,  नहीं तो इन सब की जान चली जाएगी,  इन्हें तुरंत हॉस्पिटल ले जाने की जरूरत है। रेनू बहुत परेशान हो जाती हैं कि, अब मैं क्या करूं कैसे अपने भाई को बचाऊ । रेनू,  रवि से कहती हैं............भाई तुझे अब इस राक्षस के साथ जाना होगा............रवि कहता है............ नहीं दीदी,  मैं नहीं जाऊंगा,  मुझे बहुत डर लगता है। रेनू रवि को समझाती हैं कि, अगर तुम इसके साथ नहीं गया तो यह सब को मारेगा और अभी तो सब लोग घायल हैं लेकिन क्या पता इनमें से कई लोगों की जान चली जाए, क्या तू यही चाहता है कि,  तेरी वजह से हजारों लोगों की जान चली जाए । रवि बोलता है............नहीं दीदी............रेनू कहती है............मेरे भाई, तू इस राक्षस के  साथ चला  जा,  मैं मुझे जरूर बचाने  आऊंगी,  यह मेरा वादा है············· रवि कहता है............लेकिन यह मुझे खा गया तो............रेनू कहती है............नहीं यह तुम्हें नहीं खाएगा क्योंकि अगर इसे तुम्हें खाना होता तो यह किसी को भी खा सकता था, यह बस तुम्हें अपने साथ ले जाना चाहता है इसने किसी को जान से भी नहीं मारा सिर्फ सब को घायल किया है, तुम इसके साथ जाओ मेरे भाई,  मैं तुम्हें जरूर बचाने  आऊंगी। रवि,  रेनू की बात मान जाता है और उस राक्षस के साथ चला जाता है, रेनू बहुत रोती है और कुछ ही घंटों में नानी का गांव भी आ जाता है।