अगले दिन दिव्या अपने घर गई, घर जाते ही वो रितिका से मिली और रितिका को 10 का नोट दिखाया । रितिका ने कहां...........मैंने कहा था ना, यह नोट तुझे जरूर मिलेगा, दिव्या बोली........... तेरी बात ठीक है लेकिन इस नोट पर देख कितना सब कुछ लिखा है। रितिका बोली........... हां, तेरी बात बिल्कुल ठीक है लेकिन तूने नोट को ध्यान से नहीं देखा, नोट पर बहुत कुछ लिखा है लेकिन कुछ ऐसा भी लिखा है जो बिल्कुल अलग है। रितिका ने दिव्या को नोट दिखाया और कहां देख ज्यादातर फालतू की बातें लिखी है लेकिन यहां पर कुछ अच्छा लिखा है "आपकी किस्मत आपके हाथो में है" ऐसा कोई समझदार ही लिख सकता है । दिव्या बोली तू ठीक कह रही है, मैंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। रितिका बोली........... तो तू अब क्या करना चाहती हैं? दिव्या बोली........... मुझे इन सब में नहीं पड़ना है, रितिका ने कहा कि जवाब तो दे, क्या पता तुझे फिर से जवाब मिले, लेकिन दिव्या मना करती रह गई लेकिन रितिका ने उस पर फिर से लिख दिया। रितिका ने दिव्या से कहा कि यह नोट तू वापस उसी दुकानदार को दे देना। दिव्या बोली........... में यह सब नहीं करने वाली, रितिका ने कहा यार कर ले, क्या पता तुझे कोई बहुत खास मिल जाए । दिव्या फिर से रितिका की बात मान गई । कुछ हफ्तों बाद दिव्या वापस चली गई, वहां पर जाकर उसने नोट उसी दुकानदार को दे दिया। कुछ दिनों बाद दिव्या आकांक्षा को लेकर उसी दुकान पर गए और कुछ सामान खरीदा दुकानदार ने फिर से उसे वोट दिया नोट पर फिर से कुछ लिखा था। इसी तरह से यह सिलसिला चलता रहा, दिव्या बहुत खुश थी। आकांक्षा, दिव्या से बोली........... तू पागल है, इस तरह से हमें किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए, तूने उसका नाम पूछा, दिव्या बोली...........नहीं। अगले दिन दिव्या ने उससे उसका नाम पूछा, उसने अपना नाम अविनाश बताया। दिव्या अविनाश सेसे बात करके बहुत खुश होती, धीरे-धीरे करके नोट पर लिखना बंद कर दिया और चिट्टियां लिखना चालू कर दिया, चिट्टियां जैसे तैसे करके दोनों के पास पहुंचती। दोनों एक दूसरे से कभी नहीं मिले। एक साल तक चिट्टियो का सिलसिला चलता रहा। एक दिन अचानक दिव्या को अविनाश की चिट्ठी मिली , उसमें लिखा था, मैं तुमसे मिलना चाहता हूं, यह चिट्टी कुछ अलग थी, उसकी लिखावट भी कुछ अलग थी, दिव्या ने चिट्ठी लिखी और पूछा तुम्हारी लिखावट अलग है लेकिन में तुमे पहचानूगी कैसे? अविनाश ने कहा कि मेरे हाथ में चोट लगी है इसलिए मैं ढंग से लिख नहीं पा रहा हूं, हम उसी दुकान पर मिलेंगे। दिव्या बहुत परेशान हो जाती हैं और अविनाश की बताइ हुइ जगह पर उससे मिलने चली जाती है। अविनाश को देखकर दिव्या बहुत खुश हो जाती है । कुछ दिन बाद अविनाश ने दिव्या को शादी के लिए कहा, दिव्या बहुत खुश थी। दिव्या के परिवार वाले भी मान गए औरअविनाश और दिव्या की शादी हो गई, दोनों बहुत खुश थे। तीन महीने बाद, एक दिन दिव्या क्लीनिक से अपने घर आ रही थी, घर आते समय रास्ते में एक पुल पड़ता है और पुल से गुजरते समय पुल टूट गया, दिव्या नीचे समुंद्र में गिर गई, समुंद्र का बहाव इतना तेज था कि, उसे कोई बचा नहीं सका ।
Monday, December 30, 2019
Saturday, December 28, 2019
दस रुपए का नोट........... एक प्रेम कहानी (पहला भाग)
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