यह कहानी दिव्या और अविनाश की है। दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते हैं, लेकिन एक दूसरे से बिल्कुल अनजान । दिव्या बहुत चंचल थी । वह हमेशा अपने दोस्तों को परेशान करती । स्कूल के पास एक छोटी सी चाय की दुकान थी। दिव्या और दिव्या के सभी दोस्त उस दुकान पर गए हैं और सब ने मिलकर चाय पी, तभी दिव्या की दोस्त रितिका ने दस का नोट निकाला और उस नोट पर लिख दिया,
"तुम ही मेरी किस्मत हो" रितिका ने नोट दिव्या को दिया और कहा, यह नोट तुम चाय वाले को दे दो.......... दिव्या ने पूछा .......... तू करना क्या चाहती है? रितिका बोली.......... अगर इस नोट पर जो लिखा है उसका जवाब आया तो तुम्हें उसके आगे भी उसे जवाब देना होगा। दिव्या ने कहा कि..........यह फालतू का काम है, मैं यह नहीं करना चाहती। रितिका हंसने लगी, बस डर गई, दिव्या बोली.......... नहीं मैं डरी नहीं। दिव्या ने रितिका से वह नोट लिया और चाय वाले को दे दिया। वहां से सभी दोस्त चले गए। दिव्या.......... रितिका से, यह सब क्यों करना चाहती हैं, कुछ ही महीनों में स्कूल बंद हो जाएगा, हमारी पढ़ाई खत्म हो जाएगी और हम इस स्कूल से चले जाएंगे, इस नोट का करना क्या चाहती हैं? रितिका बोली.......... पता नहीं, क्या पता तेरी किस्मत जुड़ जाए, इस नोट से, क्या पता तुझे कोई मिल जाए? दिव्या हंसने लगी, तू पागल है, ऐसा नहीं होता और उस नोट पर कोई भी कुछ नहीं लिखेगा तू देख लेना, रितिका बोली..........वह तो पता चल जाएगा, "दो दिन बाद" ।
दो दिन बाद रितिका और दिव्या चाय की दुकान पर गई और चाय वाले से कहा की ऐसा कोई 10 का नोट है जिस पर कुछ लिखा है। दुकानदार बोला.......... नहीं, उसने चेक किया लेकिन उसे ऐसा कोई नोट नहीं मिला। दिव्या बोली.......... देखा मैंने कहा था ना, यह सब फालतू का काम है। रितिका और दिव्या वहां से चले जाते हैं।
कुछ महीनों बाद दिव्या और रितिका 12वीं पास करके स्कूल से चली जाती हैं।
तीन साल बाद दिव्या बड़े शहर में मेडिकल की तैयारी करने चली जाती है। वहां पर उसे आकांक्षा मिलती है, जो उसकी बहुत अच्छे दोस्त बन जाती है।
एक दिन की बात है, आकांक्षा और दिव्या बाहर घूमने जाते है। आकांक्षा एक दुकान से कुछ सामान खरीदती हैं। दुकानदार उसे कुछ पैसे वापस करता है, उसमें से एक नोट पूरी स्याही से लिखा हुआ, आकांक्षा ने नोट दुकानदार को दिया और कहा यह नोट नहीं चलेगा, आप दूसरा नोट देदो, दुकानदार कहता है.......... सभी यही बोलते हैं, पता नहीं किस बेवकूफ ने इस पर यह लिखा था, यह नोट पूरा भरा हुआ है, कोई इसे लेना ही नहीं चाहता है, आकांक्षा दुकानदार से बहस करने लगती है, तभी दिव्या उसके पास आती हैं और पूछती हैं, क्या हुआ आकांक्षा कहती है? आकांक्षा.......... अरे यार देख इस नोट पर कुछ लिखा हुआ है, दिव्या नोट को देखकर हैरान हो जाती है कि, यह तो वही 10 का नोट है और वह उस नोट को ले लेती हैं और वहां से आकांक्षा को लेकर चली जाती है। आकांक्षा बोलती हैं.......... तू पागल है, यह नोट कौन लेगा? पूरा भरा हुआ है, कहीं भी कुछ बचा नहीं है। दिव्या आकांक्षा को पूरी बात बताती हैं, आकांक्षा बोलती है.......... तू और तेरी दोस्त दोनों पागल है, इस नोट पर इतना सब कुछ लिखा है, तुझे कैसे पता चलेगा कि इनमें से कौन अच्छा है? ऐसा कोई करता है, दिव्या बोलती है..........तू बिल्कुल ठीक कह रही है ।
No comments:
Post a Comment